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आखिर क्यों कोई हवाई जहाज तिब्बत के ऊपर से नहीं गुजरता

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हेल्लो दोस्तों आज की पोस्ट में हम आपको बताते हैं तिब्बत के कुछ रोचक तथ्य बातें
तिब्बत चीन का एक स्वायत्त (autonomous) क्षेत्र है। यह चीन के दक्षिण-पश्चिम भाग में है, और यह भारत के साथ पश्चिम में नेपाल, दक्षिण-पश्चिम में बर्मा, और दक्षिण-पूर्व में भूटान के साथ सीमा साझा करता है।

तिब्बती पठार दुनिया में सबसे ऊंचा है, और यह महान हिमालय का घर है। एवरेस्ट (8850 मीटर), कंचनजंगा (8586 मीटर), माउंट कैलाश (6638 मीटर), मकालू (8481 मीटर), चो ओयू (8201 मीटर) जैसे पर्वत तिब्बती भूमि में ऊंचे हैं। इस पर्वत श्रृंखला की औसत ऊँचाई 8000 मीटर है।ये जानकारी आपको यह समझने में मदद करते हैं कि विमान तिब्बत पर उड़ान भरने के लिए क्यों नहीं चुनते हैं।
जैसे कि हम सभी जानते हैं कि तिब्बत, भारत और चीन के मध्य में पड़ोसी देश है। तिब्बत पूरी दुनिया में अपनी अलग ही पहचान रखता है फिर वो चाहे आध्यात्मिक दृष्टि से हो या फिर पर्यटन की दृष्टि से। समुद्र से काफी ऊॅंचाई पर होने और विशालकाय पर्वत शृंंखलाएं से घिरा होने के कारण तिब्बत को एक ओर नाम से जाना जाता है और इसलिए इसे दुनिया की छत भी कहा जाता है।

दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ों की एक श्रृंखला के साथ, 8850 मीटर (29035 फीट) में सबसे ऊंचा एवरेस्ट - यह विमानों के लिए एक विशाल पड़ाव बन जाता है। वाणिज्यिक विमानों के लिए अनुमति दी जाने वाली उच्चतम ऊंचाई 28- 35,000 फीट (8000 मीटर) है। यही कारण है कि तिब्बत के ऊपर विमान नहीं उड़ते हैं।

तिब्बत पृथ्वी के उन विशेष भागों में से एक है जहॉं विमान की सेवा बहुत ही कम है। ऊॅंचाई पर होने के कारण इसके ऊपर से विमानों का उड़ पाना असंभव सा है। जिस वजह से यहॉं विमानों की आवाजाही ना के बराबर ही है। इसके बारे में विमान विशेषज्ञों ने अपनी-अपनी राय दी है। टिम हिब्बेट्स जो कि एक विमान विशेषज्ञ हैं उनका कहना है कि यह दुनिया का सबसे कम दाब वाला क्षेत्र है जिस वजह से यात्रियों के लिए सिर्फ 20 मिनट तक ही ऑक्सीजन उपलब्ध कराई जा सकती है।

हम सभी जानते हैं कि वायुमंडल की चार परतें हैं और पृथ्वी के सबसे करीब एक (troposphere) है जो जमीनी स्तर से 7 मील ऊपर तक जारी है। हिमालय 5.5 मील की ऊँचाई पर है। वे वायुमंडल में एक बिंदु पर हैं जहां एक परत दूसरे को मिलती है। अधिकांश विमान क्षोभमंडल (troposphere) की ऊपरी सीमा में उड़ते हैं और (stratosphere) की निचली परत में उड़ान भरने की सलाह केवल तभी दी जाती है जब आपके पास ऑक्सीजन की पर्याप्त आपूर्ति हो।


इस विषय पर एक विशेषज्ञ का कहना है कि तिब्बत का वातावरण बाकी हवाई मार्गों की तुलना में बेहद भिन्न है क्योंकि ऊॅंचाई पर होने और माउन्ट एवरेस्ट से नजदीकी होने के कारण जेट धाराएं तेजी से चलती है जिससे एक विमान के लिए इतनी तेज गति की धाराओं का सामना कर पाना किसी खतरे से खाली नही है। तिब्बत में हवाई पट्टी इतनी संकीर्ण है कि अब तक दुनिया में केवल 8 पायलट यहां विमान उतार पाने में सक्षम हो पाए।

जैसे-जैसे वायुमंडल की ऊंचाई बढ़ती है, वैसे वैसे हवा पतली होती रहती है। इसका मतलब है कि जैसे-जैसे हम ऊपर जाते हैं हवा में ऑक्सीजन की मात्रा कम होती जाती है। और ऊंचाई में वृद्धि के साथ, हवा के दबाव में कमी होती है। जिसके परिणामस्वरूप वायु अशांति होती है।
अधिकांश विमानों की क्षमता 20,000 फीट से अधिक उड़ान भरने की होती है। लेकिन अधिकांश एयरलाइनरों में यात्री ऑक्सीजन के केवल 20 मिनट होते हैं और विमानन नियमों के अनुसार, यात्रियों की ऑक्सीजन खत्म होने से पहले एक उड़ान को 10,000 फीट तक उतरना चाहिए। तिब्बत में 28,000-30,000 फीट की ऊंचाई पर पर्वत श्रृंखलाओं के व्यापक विस्तार के साथ, पायलटों के लिए विमानों को 10,000 फीट की ऊंचाई तक नीचे लाना मुश्किल हो जाता है।

एक और जरूरी बात ये की इस क्षेत्र में अगर कोई विमान आता भी है तो, यदि कोई आपातकालीन स्थिति आती है तो इस क्षेत्र में कोई आसपास का हवाई अड्डा भी नही है जहाँ विमान को उतारा जा सके।

हिब्बेट्स ने आगे बताते हुए कहा है 'आपातकाल की स्थिति में इतने कम समय में बड़ी संख्या में लोगों को बचा पाना बिल्कुल भी संभव नही है। कैथे पैसेपिक के द्वारा तिब्बत का दूसरा मार्ग संभव हो पाया है।' एयरलाइन के विशेषज्ञ का कहना है कि तिब्बती पठार के उपर हवाई यातायात इसलिए संभव नही है कि क्योंकि इस क्षेत्र में हवा की कमी है इसलिए एक विमान के लिए उड़ पाना वहां संभव नही है। उन्होने बताया कि भारत और चीन के बीच में पारस्परिक हवाई सेवांए बाकी देशों की तुलना में कम है। हालांकि दोनो देश एक-दूसरे के पडोसी हैं फिर भी दोनों देशों की संस्कृति बिल्कुल अलग-अलग है।

यह एक रहस्य नहीं है कि हवाई जहाज तिब्बत के ऊपर से क्यों नहीं उड़ते हैं, लेकिन यह वैज्ञानिक कारण हैं जो तिब्बत पर उड़ान भरना असंभव बनाते हैं।

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