महाभारत से जुड़े रोचक तथ्य। Interesting facts related to Mahabharata

महाभारत से जुड़े रोचक तथ्य


क्या आप जानते हैं


महाभारत से जुड़े रोचक तथ्य

भगवान श्री कृष्ण वासुदेव देवकी की आठवीं सन्तान थे।

क्या आप जानते है कि श्री कृष्ण की 16100 रानियां व 8 पटरानियां थी।

क्या आपको पता है महाभारत युद्ध की समाप्ति पर अर्जुन और श्रीकृष्ण के रथ से उतरते ही रथ धू-धूकर जल उठा और पूरी तरह भष्म हो गया था।

खाटू श्याम महाभारत में बर्बरीक के रूप में हैं, जिन्हें श्री कृष्ण ने खाटू नाम दिया।

क्या आपको पता है चक्रव्यूह में फंसने के बाद अभिमन्यु को 6 महारथियों ने मिलकर मारा था।

 दुर्योधन के पुत्र का वध अर्जुन पुत्र अभिमन्यु ने किया था।

क्या आप जानते है जरासंध व भीम का मल्लयुद्ध 14 दिन तक चला ।

क्या आपको पता है ब्रह्मास्त्र का प्रयोग सिर्फ दो ही योद्धा अर्जुन और अश्वत्थामा द्वारा किया गया था।

क्या आपको पता है भीष्म पितामह 58 दिन तक शर शैय्या पर पड़े रहे।

कृष्ण के भाई बलराम जी की मृत्यु समाधि लेकर हुई थी।

महाभारत युद्ध के तीसरे दिन श्री कृष्ण ने अपनी प्रतिज्ञा तोडकर चक्र उठाकर भीष्म को मारने दौड पड़े थे।

क्या आपको पता है एकलव्य के पिता का नाम हिरण्यधनु था।

महाभारत के युद्ध में पांडव और कौरव की सेना का अनुपात 7:11 का था।

धृतराष्ट्र अपने पिछले जन्म मैं एक बहुत ही दुष्ट राजा था। जिसके कारण उन्हें अगले जन्म में अंधे रहने का श्राप मिला था।

धृतराष्ट्र के 101वें पुत्र का नाम युयुत्सु था। युयुत्सु उनका इकलौते ऐसा पुत्र थे, था, जो महाभारत के भीषण युद्ध के बाद भी जीवित बच गया था।

 

 

वेद व्यास

महाभारत वेद व्यास जी ने लिखा था। वेद व्यास सत्यवती के पुत्र थे और उनके पिता ऋषि पराशर थे। सत्यवती जब कुंवारी थी, तब वेद व्यास ने उनके गर्भ से जन्म लिया था। बाद में सत्यवती ने हस्तिनापुर महाराजा शांतनु से विवाह किया था। शांतनु के पुत्र भीष्म थे, जो गंगा के गर्भ से जन्मे थे।

 


 


महाभारत को जया के रूप में जाना जाता था

बहुत समय पहले तक महाभारत को इस नाम से नहीं जाना जाता था। यह मूल रूप से जयम उसके बाद जया के रूप में जाना जाता था। मूल महाकाव्य को जया कहा जाता था, फिर इसे विजया, फिर भारत और अंत में महाभारत कहा जाता था।

 


भारत’ ग्रंथ

इस ग्रंथ का रचना काल 3100 ईसा पूर्व के लगभग माना जाता है। वेद व्यास के कहने पर शिष्ट वैशम्पायनजी ने इस ग्रंथ को जन्मजेय के यज्ञ समारोह में सुनाया था, तब इस ग्रंथ को ‘भारत’ कहते थे।

 


महाभारत श्लोक

जब महाभारत का नाम जयम उसके बाद जया था तब उसमे लगभग पच्चीस हजार श्लोक थे। लेकिन जब इसका नाम महाभारत पड़ा तब एक लाख श्लोक थे।

 

18 दिन महाभारत का युद्ध

हम सब जानते हैं महाभारत का युद्ध 18 दिन चला था पर क्या आप जानते हैं, मार्गशीर्ष शुक्ल 14 को महाभारत युद्ध प्रारम्भ हुआ था जो लगातार 18 दिनों तक चला था।

 


महाभारत युद्ध

महाभारत का युद्ध हरियाणा में स्थित कुरुक्षेत्र के आसपास हुआ माना जाता है। महाभारत प्राचीन भारत में वैदिक काल के इतिहास का सबसे बड़ा युद्ध था। इस युद्ध में लाखों क्षत्रिय योद्धा मारे गये जिसके परिणामस्वरूप वैदिक संस्कृति तथा सभ्यता का पतन हो गया था

 


महाभारत युद्ध में 18 अंक का महत्त्व

महाभारत युद्ध में 18 अंक का बहुत ही महत्त्व है। 18 Number Mahabharata Facts ; जैसे ऋषि वेदव्यास ने महाभारत ग्रंथ ‍की रचना की जिसमें कुल 18 पर्व हैं- आदि पर्व, सभा पर्व, वन पर्व, विराट पर्व, उद्योग पर्व, भीष्म पर्व, द्रोण पर्व, अश्वमेधिक पर्व, महाप्रस्थानिक पर्व, सौप्तिक पर्व, स्त्री पर्व, शांति पर्व, अनुशासन पर्व, मौसल पर्व, कर्ण पर्व, शल्य पर्व, स्वर्गारोहण पर्व तथा आश्रम्वासिक पर्व। भागवत गीता में 18 अध्याय हैं और महाभारत पुस्तक में भी 18 अध्याय ही हैं। कृष्ण ने कुल 18 दिन तक अर्जुन को ज्ञान दिया। 18 दिन तक ही युद्ध चला। गीता में भी 18 अध्याय हैं। कौरवों और पांडवों की सेना भी कुल 18 अक्षोहिनी सेना थी जिनमें कौरवों की 11 और पांडवों की 7 अक्षोहिनी सेना थी। इस युद्ध के प्रमुख सूत्रधार भी 18 थे। इस युद्ध में कुल 18 योद्धा ही जीवित बचे थे।

 


 

आठवें अवतार

भगवान कृष्ण का जन्म आठवें अवतार के रूप में अट्ठाईसवें द्वापर में में हुआ था और वो देवकी की आठवीं सन्तान थे।

 


श्रीकृष्ण की रानियां व पटरानियां

क्या आप जानते है श्री कृष्ण की 16100 रानियां व 8 पटरानियां थी। ये सभी 8 पटरानियां उनकी विवाहित पत्नियां थी। इनका नाम रुक्मणि, जाम्बवंती, सत्यभामा, कालिंदी, मित्रवृंदा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा था।

 


श्रीकृष्ण के सखा

श्रीकृष्ण के कई सखा (मित्र) थे, जिनके नाम हैं मधुमंगल, सुबाहु, सुबल, भद्र, सुभद्र, मणिभद्र, भोज, तोककृष्ण, वरूथप, श्रीदामा, सुदामा, मधुकंड, अर्जुन, विशाल, रसाल, मकरन्‍द, सदानन्द, चन्द्रहास, बकुल, शारद, बुद्धिप्रकाश आदि। इन सब सखाओं में मधुमंगल, श्रीदामा व सुदामा से भगवान श्रीकृष्ण का अनन्य प्रेम व लगाव था।

 


श्री कृष्ण से रिश्ता

अर्जुन भगवान श्री कृष्ण के जीजा थे और दूसरी ओर श्रीकृष्ण दुर्योधन के समधी भी थे। अर्जुन ने श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा से विवाह किया था। दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा ने श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब से प्रेम विवाह किया था। अर्जुन की माता कुंति भगवान श्रीकृष्ण की बुआ अर्थात वसुदेवजी की बहन थी। अर्जुन पुत्र अभिमन्यु की पत्नी वत्सला श्रीकृष्ण के भाई बलराम की बेटी थी।

 


द्रौपदी के पांच पति

हम सभी जानते हैं की द्रौपदी के पांच पति थे। लेकिन क्या आप जानते हैं द्रौपदी अपने पिछले जन्म मैं इन्द्र्सेना नाम की ऋषि पत्नी थी। उसके पति संत मौद्गल्य का देहांत जल्दी ही हो गया था। अपनी इच्छाओं की पूर्ति की लिये उसने भगवान शिव से प्रार्थना की। जब शिव उसके सामने प्रकट हुए तो वह घबरा गयी और उसने 5 बार अपने लिए वर मांगा। भगवान शिव ने अगले जन्म मैं उसे पांच पति दिये।

 


धृतराष्ट्र क्यों अंधे थे 

हम सब जानते हैं धृतराष्ट्र जन्म से अंधे थे, पर क्या आप जानते हैं धृतराष्ट्र अपने पिछले जन्म मैं एक बहुत ही दुष्ट राजा था। एक दिन उसने एक नदी मैं एक हंस जो अपने बच्चों के साथ आराम से विचरण कर रहा था देखा। वो हंस को इतना खुश न देख सका उसने आदेश दिया की उस हंस की आँख फोड़ दी जायैं और उसके बच्चों को मार दिया जाये। इसी वजह से अगले जन्म मैं वह अंधा पैदा हुआ और उसके पुत्र भी उसी तरह मृत्यु को प्राप्त हुये जैसे उस हंस के।

 


गांधारी ने अपनी आंखों की पट्टी हटाई

धृतराष्ट्र नेत्रहीन थे, इसलिए गांधारी भी अपनी आंखों से नहीं देखना चाहती थी। जब उनकी शादी हुई, तो उसने अपनी बाकी जिंदगी अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर बिताने की कसम खा ली। लेकिन क्या आप जानते हैं एक बार, जब कृष्ण ने हस्तिनापुर दरबार में अपना विराट रूप दिखाया था, तब उसने अपनी आंखों की पट्टी हटाकर देखा था।

 


बलराम महाभारत युद्ध के क्यों नहीं शामिल हुए

कृष्ण के भाई बलराम बहुत शक्तिशाली थे। उन्होंने कई युद्ध लड़े थे लेकिन उनके महाभारत के युद्ध में शामिल नहीं हुए क्योंकि वो कौरवों और पांडवों के समान मित्र थे। उन्होंने कृष्ण को भी दोनों के बीच में पड़ने से मना किया था। इसलिए श्री कृष्ण ने युधिष्ठर से उन्हें या फिर उनकी सेना में से एक को चुनने के लिए कहा था। इसलिए श्री कृष्ण भी केवल अर्जुन की सारथि बने। बाद में बलराम जी की मृत्यु समाधि लेकर हुई थी।

 


दुर्योधन नाम असली नहीं

दुर्योधन का असली नाम सुयोधन था जिसका अर्थ है ‘एक महान योद्धा’। लेकिन वह स्वयं दुर्योधन ही था जिसने अपना नाम सुयोधन से बदलकर दुर्योधन कर लिया, जिसका अर्थ होता है ‘एक ऐसा व्यक्ति जिसे कभी हराया नहीं जा सकता’। लेकिन महाभारत काल में दुर्योधन के बदले नाम को उसके बुरे कर्मों के कारण बताया गया।

 


 

दुर्योधन का अपमान

महाभारत की प्रचलित कथाओं में यह माना जाता है कि पांच पाण्डवों की इकलौती पत्नी द्रौपदी द्वारा दुर्योधन को लज्जित किया गया था परंतु असल महाभारत ग्रंथ में ऐसा कोई भी अध्याय शामिल नहीं है, जिसमें द्रौपदी द्वारा दुर्योधन को लज्जित किया गया हो। वह तो थे जिसने दुर्योधन का अपमान करने का साहस किया था।

 


इंद्रप्रस्थ का महल

हस्तिनापुर खोने के बाद पाण्डवों ने अपने बल पर इंद्रप्रस्थ का निर्माण किया। यह एक ऐसी माया नगरी थी जिसका एक-एक पत्थर चमकदार, एक-एक कोना आंखों को आकर्षित करने वाला था। जब पहली बार दुर्योधन ने इंद्रप्रस्थ का महल देखा तो वह चकित रह गया।

 


धृतराष्ट्र और गांधारी के 100 पुत्र नहीं थे

हम सब जानते हैं की धृतराष्ट्र और गांधारी के 100 पुत्र हुये थे, जो कौरवों के नाम से जाने जाते हैं। पर क्या आप जानते हैं कि धृतराष्ट्र के 101वें पुत्र का नाम युयुत्सु था। युयुत्सु उनका इकलौते ऐसा पुत्र थे, था, जो महाभारत के भीषण युद्ध के बाद भी जीवित बच गया था। दरअसल धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी की सेवा के लिए सुगधा नामक दासी को नियुक्त किया गया था, जो वैश्य वर्ण से संबंध रखती थी। इनसे धृतराष्ट्र को युयुत्सु की उत्पत्ति हुई।

 


कर्ण

दुर्योधन और कर्ण को एक श्रेष्ठ मित्र के रूप में जाना जाता है, पर क्या आप जानते हैं कि कर्ण पांडवों के बड़े भाई थे। कर्ण मूल रूप से सूर्य पुत्र था, जिसके फलस्वरूप असल में वह क्षत्रीय वर्ण से नाता रखता था, परंतु कुंती द्वारा जन्म देते ही अलग कर दिए जाने पर वह सूतपुत्र कहलाया। कर्ण की मृत्यु पर यदि कोई सबसे ज्यादा दुखी था तो वह था स्वयं दुर्योधन। वह इतना हताश अपने भाइयों की मृत्यु पर भी नहीं हुआ था।

 


शकुनि कौरवों के हितैषी नहीं 

हम सब जानते हैं की शकुनि कौरवों का मामा था और वो उनका सबसे बड़ा हितैषी था, जबकि शकुनि केवल दिखावे की लिए उनका शुभचिंतक था। दरअसल वो कौरवों का सबसे बड़ा दुश्मन था। कौरवों को छल व कपट की राह सिखाने वाले शकुनि उन्हें पांडवों का विनाश करने में पग-पग पर मदद करते थे, लेकिन उनके मन में कौरवों के लिए केवल बदले की भावना थी।

 


अश्‍वत्थामा आज भी जिन्दा

माना जाता है कि गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र अश्‍वत्थामा आज भी जिन्दा है। दरअसल अश्‍वत्थामा एक बहुत बड़ा योद्धा था। महाभारत के युद्ध में उसने एक ब्रह्मास्त्र छोड़ा जिससे हज़ारों लोग मर गए। यह देख श्री कृष्ण को क्रोध आ गया और उन्होंने उसे श्राप दिया की वह इन सब मृतक लोगों का पाप ढोयेगा और 3 हज़ार सालों तक निर्जन स्थानों पर भटकता रहेगा। कहाँ जाता है इस श्राप के प्रभाव से आज भी अश्‍वत्थामा रेगिस्तानों में भटक रहा है।

 


भाई के कार्यों के खिलाफ

धृतराष्ट्र के दो पुत्रों, विकर्ण और युयुत्सु ने दुर्योधन की अनुचित नीतियों और कार्यों के खिलाफ थे और वास्तव में द्रौपदी को अपमानित करने वाले पासा के खेल का विरोध किया था।

 


अभिमन्यु

कृष्ण के अनुसार, अभिमन्यु एक बहुत शक्तिशाली दानव (कालयवन) का अवतार था। इसलिए चक्रव्यूह वास्तव में अभिमन्यु को मारने के लिए शुरू किया गया था क्योंकि यह एकमात्र तरीका था जिससे अभिमन्यु मोक्ष को प्राप्त कर सकते थे। इसलिए, कृष्ण ने चक्रव्यूह से बाहर आने का ज्ञान कभी नहीं दिया।

 


भीष्म पितामह

क्या आप जानते हैं भीष्म पितामह का वास्तविक नाम देवव्रत था। दरअसल भीष्म पितामह हस्तिनापुर के राजा शांतनु तथा देवनदी गंगा के पुत्र थे। इनका वास्तविक नाम देवव्रत था। इनकी योग्यता देखकर शांतनु ने इन्हें युवराज बना दिया। एक दिन महाराज शांतनु जब शिकार खेलने गए तो उन्होंने नदी के किनारे एक सुंदर कन्या जिसका नाम सत्यवती था, वह उससे विवाह करना चाहते थे। सत्यवती के पिता निषादराज तैयार तो हो गए पर उन्होंने यह शर्त रखी कि मेरी पुत्री से उत्पन्न संतान ही आपके राज्य की अधिकारी हो। लेकिन शांतनु ने यह शर्त अस्वीकार कर दी क्योंकि वे पहले ही देवव्रत को युवराज बना चुके थे।

 


 

भीष्म पितामह की प्रतिज्ञा

जब शांतनु (भीष्म पितामह) को इस बात की जानकारी हुई तो अपने पिता के लिए सत्यवती का हाथ मांगा। निषादराज ने वही शर्त दोहराई। तब देवव्रत ने प्रतिज्ञा ली कि इस कन्या से उत्पन्न पुत्र ही राज्य का अधिकारी होगा। तब निषादराज ने कहा कि यदि तुम्हारे पुत्र ने उसे मारकर राज्य छिन लिया तब क्या होगा? यह सुनकर भीष्म ने सभी दिशाओं और देवताओं को साक्षी मानकर आजीवन ब्रह्मचारी रहने की प्रतिज्ञा ली। इस भीष्म प्रतिज्ञा के कारण ही उनका नाम भीष्म पड़ा।

 


कर्ण युद्ध के समय अपनी विद्याएं क्यों भूल गए

आप शायद जानते होंगे कर्ण युद्ध के समय अपनी विद्याएं भूल गए थे। पर क्या आप जानते हैं, जब द्रोणाचार्य ने कर्ण को ब्रह्मास्त्र विद्या सिखाने से इंकार कर दिया, तब वो परशुराम के पास पहुंच गए। परशुराम ने प्रण लिया था कि वे इस विद्या को किसी ब्राह्मण को ही सिखाएंगे, क्योंकि इस विद्या के दुरुपयोग का खतरा बढ़ गया था। कर्ण यह सीखना चाहता थे, तब उन्होंने खुद को ब्राह्मण का पुत्र बताया और उनसे यह विद्या सीख ली। जब परशुराम को यह पता चला तो उन्होंने क्रोधित कर्ण को शाप दिया कि तुमने मुझसे जो भी विद्या सीखी है वह झूठ बोलकर सीखी है इसलिए जब भी तुम्हें इस विद्या की सबसे ज्यादा आवश्यकता होगी, तभी तुम इसे भूल जाओगे। कोई भी दिव्यास्त्र का उपयोग नहीं कर पाओगे। और महाभारत के युद्ध में यही हुआ।

 


 


 

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